hindi poetry / Poetry

कुछ अल्फाज़,बिना जज़्बात

वो शाम,वो रात, वो तेरी कही हर एक बात, समझते थे जिसे हम ज़िंदगी भर का साथ, रखे थे संदुक मे सजाकर खास तेरे वो अल्फाज़ | ये जाना, ये समझा, आज यहॉ, कल वहॉ, इस ज़माने मे घुमते भी है जज़्बात, कल जो थे मेरे, आज कहीं और… किसि और के लिए हैं बसते, ये जज़्बात ओह … Continue reading