hindi poetry / Poetry

कुछ अल्फाज़,बिना जज़्बात

वो शाम,वो रात, वो तेरी कही हर एक बात, समझते थे जिसे हम ज़िंदगी भर का साथ, रखे थे संदुक मे सजाकर खास तेरे वो अल्फाज़ | ये जाना, ये समझा, आज यहॉ, कल वहॉ, इस ज़माने मे घुमते भी है जज़्बात, कल जो थे मेरे, आज कहीं और… किसि और के लिए हैं बसते, ये जज़्बात ओह … Continue reading

जिंदगी कुछ इस तरह से…
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जिंदगी कुछ इस तरह से…

जिंदगी कुछ इस तरह से गुलज़ार होती, अगर उस शाम वो हमारे साथ होते , न थिरक्ते यू  हाथ किसी और के हाथ में, न  गुज़रती जिंदगी  किसी और की छाव में , उस शाम दिखाते अगर वो ये जज़्बा यू , लगते न फेरे हमारे किसी और के साथ में, जिंदगी कुछ इस तरह … Continue reading